बेंगलुरु | InterGlobe NEWS
नई दिल्ली/बेंगलुरु। ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास किए बिना निर्धारित अवधि के बाद भी वकालत जारी रखने वाले अधिवक्ताओं के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी अधिवक्ता का कथित आचरण किसी आपराधिक अपराध के तत्वों को पूरा करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की जा सकती है। केवल बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था मौजूद होने से आपराधिक अदालतों का अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं हो जाता।
यह आदेश न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश की पीठ ने 17 अक्टूबर 2026 को पारित किया। अदालत ने AIBE पास किए बिना लंबे समय तक वकालत करने के आरोपों से जुड़े मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। साथ ही, कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को ऐसे मामलों की पहचान करने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
मामला एम. प्रसन्न कुमार बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य से संबंधित है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, याचिकाकर्ता का वर्ष 2011 में कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल में अनंतिम नामांकन हुआ था। आरोप था कि उसने लगभग एक दशक तक अनिवार्य AIBE परीक्षा पास किए बिना वकालत जारी रखी और बाद में वर्ष 2021 में परीक्षा उत्तीर्ण की।
शिकायतकर्ता अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि निर्धारित योग्यता पूरी किए बिना वकालत जारी रखने से मुवक्किलों और न्यायिक व्यवस्था के हित प्रभावित हुए। इस शिकायत के आधार पर मामला मजिस्ट्रेट के समक्ष पहुंचा और जांच के लिए पुलिस को भेजा गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बार काउंसिल के पास अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की शक्ति होने का अर्थ यह नहीं है कि आपराधिक अदालतें किसी संभावित अपराध की जांच या सुनवाई नहीं कर सकतीं।
अदालत के अनुसार, यदि शिकायत में लगाए गए आरोप स्वतंत्र रूप से किसी आपराधिक अपराध के तत्वों को पूरा करते हैं, तो सक्षम आपराधिक अदालत उनका परीक्षण कर सकती है। अदालत ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता को आपराधिक शिकायत करने के लिए पहले बार काउंसिल के पास जाना अनिवार्य नहीं है, बशर्ते कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध लागू न हो।
हाईकोर्ट ने पुलिस को मामले की जांच आगे बढ़ाने और कानून के अनुसार रिपोर्ट दाखिल करने की अनुमति दी। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध सिद्ध हुआ है या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।
AIBE पास करना क्यों जरूरी है?
AIBE यानी ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन का आयोजन बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा किया जाता है। इसका उद्देश्य कानून की पढ़ाई पूरी कर राज्य बार काउंसिल में नामांकन कराने वाले पात्र अभ्यर्थियों के पेशेवर ज्ञान का मूल्यांकन करना है।
लागू नियमों के तहत, संबंधित व्यवस्था के अधीन आने वाले अनंतिम रूप से नामांकित अधिवक्ताओं को निर्धारित दो वर्ष की अवधि में परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने और अभ्यास प्रमाणपत्र संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद ही वे लागू नियमों के अनुसार वकालत जारी रखने के पात्र होते हैं।
इस मामले में अदालत ने AIBE की निर्धारित अवधि में परीक्षा उत्तीर्ण नहीं करने और इसके बावजूद वकालत जारी रखने के आरोपों को गंभीरता से लिया।
किन कानूनी प्रावधानों का उल्लेख हुआ?
मामले की रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रासंगिक प्रावधानों और एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 45 के संदर्भ में आरोपों की जांच पर विचार किया।
एडवोकेट्स एक्ट की धारा 45 उन परिस्थितियों में दंड का प्रावधान करती है, जिनमें कोई व्यक्ति कानून के तहत पात्र न होते हुए अदालत या अन्य प्राधिकरण के समक्ष वकालत करता है। वहीं, धोखाधड़ी जैसे आरोपों के संबंध में पुलिस को यह जांचना होगा कि उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों से संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व बनते हैं या नहीं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल AIBE पास नहीं करने का आरोप अपने आप हर मामले में धोखाधड़ी का अपराध सिद्ध नहीं करता। आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण लागू कानून, संबंधित व्यक्ति की स्थिति, आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगा।
कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को 45 दिन का निर्देश
हाईकोर्ट ने कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को ऐसी प्रभावी व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया, जिससे अनंतिम रूप से नामांकित अधिवक्ताओं का डिजिटल रिकॉर्ड रखा जा सके और निर्धारित दो वर्ष की अवधि पूरी होने पर AIBE की स्थिति की पहचान की जा सके।
अदालत का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों को चिह्नित करना है, जो निर्धारित पात्रता पूरी किए बिना वकालत जारी रख रहे हों। रिपोर्टों के अनुसार, बार काउंसिल को आदेश के अनुपालन के संबंध में 45 दिनों के भीतर अदालत को जानकारी देने का निर्देश दिया गया है।
क्या परीक्षा बाद में पास करने से पहले की वकालत वैध हो जाती है?
इस मामले में हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि बाद में AIBE पास कर लेने से पहले की कथित अनधिकृत वकालत के संबंध में आपराधिक कार्यवाही स्वतः समाप्त हो जाएगी।
अर्थात, यदि किसी व्यक्ति ने निर्धारित अवधि में आवश्यक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की और उस दौरान वकालत जारी रखी, तो बाद में परीक्षा पास करना अपने आप पहले के आचरण से जुड़े आरोपों को समाप्त नहीं करता। हालांकि, उस अवधि में उसकी वास्तविक कानूनी स्थिति और किसी अपराध के तत्वों की मौजूदगी का फैसला संबंधित तथ्यों और कानून के आधार पर ही होगा।
अधिवक्ताओं के लिए क्या है इस आदेश का महत्व?
यह आदेश उन अधिवक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है, जिन पर निर्धारित अवधि में AIBE उत्तीर्ण किए बिना वकालत जारी रखने के आरोप हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पेशेवर अनुशासनात्मक कार्रवाई और आपराधिक कार्यवाही अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हो सकती हैं।
अधिवक्ताओं को अपने नामांकन, AIBE परिणाम, प्रमाणपत्र और वकालत जारी रखने की पात्रता से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित रखने चाहिए। यदि किसी अधिवक्ता की पात्रता को लेकर विवाद है, तो उसे संबंधित राज्य बार काउंसिल से स्थिति स्पष्ट करानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेनी चाहिए।
निष्कर्ष
कर्नाटक हाईकोर्ट का यह आदेश इस बात पर जोर देता है कि वकालत करने के लिए लागू कानूनी पात्रता और पेशेवर नियमों का पालन आवश्यक है। AIBE पास किए बिना निर्धारित अवधि के बाद भी वकालत जारी रखने के आरोपों पर, परिस्थितियों के अनुसार, अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ आपराधिक कार्यवाही भी हो सकती है।
अब कर्नाटक स्टेट बार काउंसिल को ऐसे मामलों की पहचान करने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार करनी है। इस आदेश का वास्तविक प्रभाव बार काउंसिल की कार्रवाई और संबंधित मामलों में जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के परिणामों से स्पष्ट होगा।
स्रोत: LiveLaw, The Indian Express तथा उपलब्ध न्यायिक रिपोर्टें।
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