न्यायिक समझौते के तहत संपत्ति पर अधिकार छोड़ने के बाद उसी संपत्ति को किसी तीसरे व्यक्ति के नाम उपहार में देने के अधिकार पर उठते हैं कानूनी सवाल
पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा
नई दिल्ली | 15 अक्टूबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पारिवारिक समझौते और न्यायालय द्वारा मंजूर समझौते के तहत जिस संपत्ति पर कोई व्यक्ति अपना दावा छोड़ चुका हो, वह बाद में उस संपत्ति को किसी तीसरे व्यक्ति के नाम गिफ्ट नहीं कर सकता, यदि उसके पास उस संपत्ति में कोई वैध हस्तांतरण योग्य अधिकार शेष नहीं है। इसी सिद्धांत को लागू करते हुए शीर्ष अदालत ने एक पुराने संपत्ति विवाद में निचली अदालत और तेलंगाना हाई कोर्ट के फैसलों को निरस्त कर दिया तथा संपत्ति पर अधिकार घोषित कराने के लिए दायर मुकदमे को मंजूर कर लिया।
यह फैसला B. Anasuyamma (Died) Per LR and Another बनाम B. Madhusudhan Reddy (Died) Per LRs and Others मामले में आया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा शामिल थे। निर्णय 14 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। इस मामले का न्यूट्रल साइटेशन 2026 INSC 1126 है।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद आंध्र प्रदेश के तत्कालीन क्षेत्र और वर्तमान तेलंगाना से संबंधित एक परिवार की पैतृक संपत्तियों के बंटवारे से जुड़ा था। मामले की शुरुआत वर्ष 1959 में हुए पारिवारिक समझौते से हुई थी, जिसमें परिवार के सदस्यों के बीच अलग-अलग संपत्तियां और हिस्से निर्धारित किए गए थे।
बी. वेंकट रेड्डी की पत्नी मणिक्यम्मा और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच 19 अप्रैल 1959 को पारिवारिक समझौता हुआ था। इसमें मणिक्यम्मा, अनासुयम्मा, मधुसूदन रेड्डी और जनार्दन रेड्डी के हिस्से निर्धारित किए गए थे।
समझौते के अनुसार, मणिक्यम्मा को कर्कलपहाड़ गांव में जमीन दी गई थी। वहीं परिवार के दूसरे सदस्यों को भी अलग-अलग गांवों में कृषि भूमि आवंटित की गई थी।
बाद में संपत्ति के बंटवारे और स्वामित्व को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके चलते मामला अदालतों तक पहुंच गया।
1986 में हुआ समझौता, हाई कोर्ट ने 1990 में दी मंजूरी
विवाद के दौरान अनासुयम्मा और उनके दत्तक पुत्र वेंकटराजी रेड्डी तथा मधुसूदन रेड्डी के बीच 24 फरवरी 1986 को समझौता हुआ।
इस समझौते में दोनों पक्षों ने संपत्ति से संबंधित अपने-अपने दावों के बारे में सहमति बनाई। अनासुयम्मा और उनके दत्तक पुत्र ने हैदराबाद के हिमायतनगर स्थित एक मकान में अपने एक-तिहाई हिस्से के दावे को छोड़ दिया। इसके बदले मधुसूदन रेड्डी को उस मकान का पूर्ण अधिकार दिया गया।
दूसरी ओर, मधुसूदन रेड्डी ने अपनी मां मणिक्यम्मा को वर्ष 1959 के पारिवारिक समझौते में मिली संपत्तियों में अपने हिस्से का दावा छोड़ दिया। ये संपत्तियां अनासुयम्मा और वेंकटराजी रेड्डी के पक्ष में छोड़ दी गईं।
समझौते के तहत मधुसूदन रेड्डी ने अनासुयम्मा और वेंकटराजी रेड्डी को 2.20 लाख रुपये भी दिए थे।
इस समझौते को न्यायालय के समक्ष रखा गया। तत्कालीन आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 7 सितंबर 1990 को संबंधित अपील का निपटारा करते हुए समझौते को प्रभावी बनाया।
2007 में उसी जमीन की गिफ्ट डीड कर दी
मामले में विवाद तब और बढ़ गया, जब मधुसूदन रेड्डी ने 24 अप्रैल 2007 को एक पंजीकृत गिफ्ट डीड के जरिए कर्कलपहाड़ गांव की कई जमीनें सिद्धार्थ रेड्डी के नाम कर दीं। सिद्धार्थ रेड्डी, जनार्दन रेड्डी के पोते थे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पाया कि गिफ्ट डीड में शामिल जमीनें मधुसूदन रेड्डी के हिस्से में नहीं आई थीं। वर्ष 1959 के पारिवारिक समझौते के अनुसार ये जमीनें मणिक्यम्मा को आवंटित की गई थीं।
इसके अतिरिक्त, मधुसूदन रेड्डी वर्ष 1986 के समझौते में इन जमीनों पर अपना दावा छोड़ चुके थे। इस समझौते को हाई कोर्ट की मंजूरी भी प्राप्त थी।
ऐसी स्थिति में इन जमीनों को गिफ्ट करने के लिए मधुसूदन रेड्डी के पास वैध अधिकार होने का सवाल महत्वपूर्ण हो गया।
गिफ्ट डीड को चुनौती देकर दायर किया गया मुकदमा
गिफ्ट डीड के बाद अनासुयम्मा, उनके दत्तक पुत्र वेंकटराजी रेड्डी और गुनना मालिनीदेवी ने वर्ष 2007 में दीवानी मुकदमा दायर किया।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि विवादित जमीनों पर उनके अधिकार घोषित किए जाएं, 24 अप्रैल 2007 की गिफ्ट डीड को शून्य और अमान्य घोषित किया जाए तथा राजस्व अभिलेखों में आवश्यक बदलाव किए जाएं।
उन्होंने विवादित संपत्तियों पर अपने कब्जे में हस्तक्षेप रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग भी की।
हालांकि, 9 अप्रैल 2012 को ट्रायल कोर्ट ने उनका मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी 12 दिसंबर 2022 को उनकी अपील खारिज कर दी।
दोनों अदालतों के फैसलों से असंतुष्ट पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों में क्या गलती पाई?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के पुराने दस्तावेजों और न्यायिक कार्यवाही का परीक्षण करते हुए पाया कि निचली अदालतों ने वर्ष 1959 के पारिवारिक समझौते और वर्ष 1986 के समझौते के कानूनी प्रभाव पर उचित ध्यान नहीं दिया था।
शीर्ष अदालत के अनुसार, हाई कोर्ट के पूर्व फैसले से मंजूर समझौते को नजरअंदाज करके संपत्ति के अधिकारों का निर्धारण करना उचित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह टिप्पणी की थी कि गिफ्ट डीड के निष्पादन पर विवाद नहीं था, जबकि संबंधित गिफ्ट डीड को चुनौती देने के लिए मुकदमा पहले ही दायर किया जा चुका था।
अदालत ने माना कि पुराने पारिवारिक समझौते और बाद में न्यायालय द्वारा मंजूर समझौते के प्रभाव को सही ढंग से समझे बिना निचली अदालतों द्वारा निकाले गए निष्कर्ष कायम नहीं रखे जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
14 अक्टूबर 2026 को दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट के 12 दिसंबर 2022 के फैसले और ट्रायल कोर्ट के 9 अप्रैल 2012 के फैसले को निरस्त कर दिया।
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए संबंधित दीवानी मुकदमे को वादियों की मांग के अनुसार मंजूर कर दिया।
इस तरह संपत्ति के स्वामित्व और गिफ्ट डीड को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में वादियों को राहत मिली।
संपत्ति विवादों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
इस निर्णय से संपत्ति विवादों में पारिवारिक समझौते और न्यायालय द्वारा मंजूर समझौते के महत्व पर प्रकाश पड़ता है।
यदि किसी व्यक्ति ने किसी संपत्ति पर अपना दावा छोड़ दिया है और बाद में उस संपत्ति पर उसका कोई वैध अधिकार शेष नहीं है, तो वह केवल गिफ्ट डीड बनाकर किसी तीसरे व्यक्ति को उस संपत्ति का अधिकार नहीं दे सकता।
ऐसे मामलों में केवल गिफ्ट डीड का पंजीकरण होना ही निर्णायक नहीं है। यह देखना आवश्यक है कि गिफ्ट करने वाले व्यक्ति के पास संपत्ति में वैध स्वामित्व या हस्तांतरण योग्य अधिकार मौजूद था या नहीं।
यह फैसला उन मामलों में भी प्रासंगिक है, जहां संपत्ति के पुराने पारिवारिक बंटवारे, न्यायालयीन समझौते और बाद में किए गए हस्तांतरण के बीच विवाद उत्पन्न होता है।
हालांकि, प्रत्येक मामले में समझौते की शर्तें, संपत्ति के स्वामित्व का इतिहास और संबंधित न्यायालय के आदेश अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए इस निर्णय को हर प्रकार की गिफ्ट डीड पर स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मुख्य संदेश है कि संपत्ति के अधिकारों का निर्धारण करते समय पुराने पारिवारिक समझौतों और न्यायालय द्वारा मंजूर समझौतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जिस व्यक्ति ने किसी संपत्ति पर अपना दावा छोड़ दिया हो और जिसके पास उस संपत्ति में कोई वैध हस्तांतरण योग्य अधिकार शेष न हो, वह बाद में उस संपत्ति को किसी तीसरे व्यक्ति के नाम गिफ्ट करके पहले के समझौते को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
केस का नाम: B. Anasuyamma (Died) Per LR and Another बनाम B. Madhusudhan Reddy (Died) Per LRs and Others
न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय
फैसले की तारीख: 14 अक्टूबर 2026
