मेरठ। चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद देश में महिला दोषियों को दिए गए मृत्युदंड को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भारत में अदालतों ने कई महिलाओं को मौत की सजा सुनाई है, लेकिन वास्तविक रूप से फांसी दिए जाने के मामले बेहद कम रहे हैं।
आजाद भारत में केवल एक महिला को फांसी
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, स्वतंत्र भारत में अब तक केवल एक महिला, रतन बाई जैन, को फांसी दी गई है। रिपोर्टों के अनुसार, 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में उसे फांसी दी गई थी। उस पर तीन युवतियों की हत्या का दोष सिद्ध हुआ था।
शबनम समेत कई महिलाएं कर रही हैं इंतजार
उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के बावनखेड़ी हत्याकांड में शबनम को अपने परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। उसकी सजा को उच्च अदालतों में बरकरार रखा गया, लेकिन अब तक उसे फांसी नहीं दी गई है।
इसके अलावा आतंकवादी घटनाओं, पारिवारिक हत्याओं और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में भी कई महिलाओं को मृत्युदंड सुनाया जा चुका है। इनमें कुछ की अपीलें और अन्य कानूनी प्रक्रियाएं अभी लंबित हैं।
डेथ रो में कितनी महिलाएं?
इंडियन एक्सप्रेस की सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मृत्युदंड का सामना कर रहे 571 लोगों में 21 महिलाएं शामिल थीं। वहीं, द स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक देश में कुल 574 कैदी मृत्युदंड का सामना कर रहे थे, जिनमें 24 महिलाएं थीं। अलग-अलग रिपोर्टों की तारीख और आंकड़ों में अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।
मौत की सजा का मतलब तुरंत फांसी नहीं
भारतीय कानून में सत्र न्यायालय से मौत की सजा मिलने के बाद हाईकोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील, पुनर्विचार याचिका और अन्य उपलब्ध कानूनी उपायों के साथ दया याचिका की प्रक्रिया भी हो सकती है। इसलिए निचली अदालत से मृत्युदंड सुनाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि दोषी को तुरंत फांसी दे दी जाएगी।
मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला के मामले में भी आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। यह मामला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि भारत में मौत की सजा कितने लोगों को सुनाई जाती है और उनमें से कितनों को वास्तव में फांसी दी जाती है।
